Cafe Reminiscence

हरे का�च की चूड़िया�

Pic by PD

उस दिन कà¥�छ कागजात ढूंढते हà¥�à¤� वो पà¥�राना लकडी का बकà¥�सा मिला , खोला तो उसमे दो काà¤�च की चूड़ियो के टà¥�कड़े मिले हरे काà¤�च की , तो सब काम छोड़ कर बस बकà¥�सा लेकर बैठ गया , और भूल गया की कà¥�या ढूंढ  à¤°à¤¹à¤¾ था , फिर अतीत में à¤�ाà¤�कने की कोशिश करने   लगा .

कोई कॉमन फ�रेंड के यहा� शादी में मिली थी वो कई साल हो ग� , शहर छोड़ने के बाद सालों बाद या फिर स�कूल छोड़ने के बाद वो मिली थी , वैसे खबर लगती रहती थी , घ�रर में कभी कबार जिक�र हो जाता था , आखिर बचपन साथ ही ग�जारा था , वो ही स�कूल , मोहल�ला , घर वालों का आपस में मेल जोल तो था ही.
मिले पà¥�रानी यादें ताज़ा करी सà¥�ख दà¥�ःख बांटे वगैराह वगैराह ,अचà¥�छी लग रही थी , हमेशा की तरह , फिर रात को मà¥�यूजिकल पà¥�रोरà¥�गà¥�राम था , गाना बजाना , डांस भी हà¥�आ  , तभी डांस करते हà¥�à¤� उसका हाथ कहीं टकराया और २-३ चूड़ियाà¤� टूट गयी , लेकिन वो इतनी मगन थी की धà¥�यान भी नहीं दिया , तब मेने वो चूड़ियों के टà¥�कड़े उठा कर अपनी जेब में रख लिà¤� , लेकिन मेने à¤�सा कà¥�यों किया , मà¥�ज़हे कभी समà¤� नहीं आया , बाद में उन टà¥�कड़ों को देखा वो हरे कांच की चूड़ियों à¤•à¥‡ टà¥�कड़े थे , तब गौर से देखा उसने खूब साडी चूड़ियाà¤� डाल रखी थी , जà¥�यादातर हरे कांच की , बहà¥�त खूबसूरत , मन तो किया अभी हाथ  à¤¥à¤¾à¤® लूं , उनà¥�हें छू कर देखूं . जिनà¥�हे बचपन में कितनी ही बार थामा होगा .लेकिन तब सोचा न था की वो  à¤¹à¤¾à¤¥ मैं  à¤…ब थाम नहीं सकता था , देर हो गयी थी .
à¤�क वजह और भी हो सकती है उन चूड़ियों के टà¥�कड़े सà¤�भालने की , हà¥�आ यूà¤� की बचपन की बातें करते हà¥�à¤� उसने बताया की उसे अचà¥�छा लगा था जब मैने उसकी फà¥�राक पर सà¥�याही छिड़क दी थी गà¥�सà¥�से में .अचà¥�छा लगा सà¥�न कर , और में  à¤”र वो दोनों ही nostalgic मूड में चले गà¤� .

à¤�क ही सà¥�कूल में जाते थे , अधिकतर साथ ही बैठते थे , वो पà¥�ने में होशियार à¤¥à¥€ à¤¹à¥‹à¤®à¤µà¤°à¥�क करने में हमेशा मदद भी à¤•à¤°à¤¤à¥€ थी , मेरे घर में मà¥�ज़हे ताने भी सà¥�ंनने पड़ते थे की ये ना हो तो लाटसाहब कभी पास ही ना हो , तब में अपना गà¥�सà¥�सा उसपर निकालता था , लेकिन थोड़ी देर बाद फिर वो ही , बचपन भी अजीब होता है , पल में तोला पल में माशा , सब भूल जाता है , लेकिन सà¥�कूल छोड़ने के बाद में सब कà¥�छ  à¤­à¥‚ल जाऊंगा , सोचा ना था .खैर किसà¥�सा à¤�सा था की शहर में मेला लगा था हफà¥�ते भर तक , सब रात को मेले में जाते थे वो भी जाती थी अपने घर वालों के साथ , उस रात भी गयी थी , में भी अपने दोसà¥�तों के साथ गया था , दà¥�सरे दिन कà¥�लास में पंडित माड़साब ने होम वरà¥�क पूछा तो कई और के साथ मà¥�ज़हे भी खड़ा होने पड़ा , लेकिन वो बैठी रही , होम वरà¥�क जो कर के लाई थी , तब मà¥�ज़हे गà¥�सà¥�सा आया , उस दिन माड़साब ने हथेली लाल कर दी थी खड़े फà¥�टà¥�टे से , सà¥�कूल के बाद उसने मेरा हाथ पकड़ कर देखने की कोशिश करी की कितनी लगी है , लेकिन में कहाà¤� मानने वाला था इतना जलà¥�दी , मà¥�ज़हे समज़ नहीं आ रहा था वो भी कल मेले में थी फिर होमवरà¥�क कब कर लिया , लेकिन वो थी ही à¤�सी .मैने बात नहीं करी और घर चला गया .

तब कोचिंग कà¥�लासेज तो होती नहीं थी , तब हम 5-10 बचà¥�चे पास ही रिटायरà¥�ड हनà¥�मान माड़साब के यहाà¤� पड़ने जाते थे शाम को , घर वाले भी सोचते थे जान छूटे , वहां तो शांति से बैठेंगे नहीं तो यहीं दोसà¥�तों के साथ बस आवारागरà¥�दी करते रहेंगे , हनà¥�मान माड़साब काशी , मथà¥�रा के पंडों जैसे दिखते थे , मासà¥�टरनी भी मोटी सी थी , उनके बचà¥�चे नहीं थे ,माड़साब धोती और  à¤Šà¤ªà¤° घर में अधिकतर कà¥�छ नहीं पहनते थे , दूध के और दाल à¤®à¥‡à¤‚ खूब सारा देसी घी डाल कर पीने के शौकीन थे , तब जà¥�यादा कैलोरी calculation नहीं होती थी , हमें भी कभी कभी खिलाते पिलाते रहते थे खास  à¤•à¤° खीर , या आटे का हलà¥�वा .माड़साब तब फीस नहीं लेते थे कहते थे पेंशन से काम चल जाता है , और किस के लिà¤� बचाना है , माà¤� फीस की जगह कभी आटा , चावल , तेल या देसी घी घर में रखवा देती थी , डैडी जिनà¥�हे वो डागदर साहेब कहते थे कभी बीमारी में उनका इलाज़ कर देते थे .
माड़साब बैठे बैठे टेड़े मेढे होकर बम छोड़ते रहते थे और हम सब दबी जबान में हà¤�सते थे , कई बार गिनते भी थे , माड़साब के यहाà¤� कलम और दवात चलती थे , और मेरे हाथ हमेशा गंदे और सà¥�याही से सने रहते थे , था भी तो बेतरतीब , खैर उस दिन जब में गà¥�सà¥�से में था और वो वो à¤�क सफ़ेद पर पिंक फूलों वाली फà¥�राक में थी तब ,टà¥�à¤�शन के बाद मैने उसकी फà¥�राक पर सà¥�याही छिड़क कर अपनी भड़ास निकाली , की मैने होमवरà¥�क नहीं किया तो तूने कà¥�यों किया , बस ये ही बात , बाद में मà¥�ज़हे घर पर भी सà¥�नना पड़ा था , उसकी माà¤� ने जो मेरी complaint  à¤•à¤°à¥€ थी .
लेकिन द�सरे ही ही दिन हम फिर दोस�त बन ग� , बचपन होता ही �सा है , ये तो जब हम अपने teens में आने के बाद 30-35 तक सब को भूल कर अपने में खो जाते हैं , न� रिश�तों में , दोस�तों में और अपने करियर में , हम उन सब लोगों को भूल जाते हैं जिन�होंने नींव रखी , मजबूत किया , संस�कार दि� , म�ज़हे याद है मैने बड़े होने के बाद कभी जानने की कोशिश ही नहीं करी की हन�मान माड़साब कैसे हैं , बस �क बार पता लगा नहीं रहे , बस इतना ही !!

उस दिन उसने बताया की उससे उसकी फà¥�राक के ख़राब होने का दà¥�ख तो हà¥�आ था लेकिन ये अचà¥�छा लगा था की होमवरà¥�क तो औरों ने भी नहीं किया था लेकिन उसका सिरà¥�फ उस पर ही गà¥�सà¥�सा होना उसे अचà¥�छा लगा था , इतने सालों बाद वो सà¥�नकर बहà¥�त अचà¥�छा लगा ,.फिर वो टà¥�कड़े …, शायद , पता नहीं .फिर कà¥�यों कभी पता नहीं किया उसके बारे में , कहाà¤� है , कà¥�या कर रही है , à¤�क सà¥�टेज के बाद ही पता लगता है कà¥�या छूटा , कà¥�या पाया , ये ही तो ज़िनà¥�दगी है ..सब कà¥�छ à¤�सा थोड़ी होता है जैसा हम चाहते हैं , या फिर à¤�सा भी होता है जो छूट गया उसे ही हम तलाशते हैं ,

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